गुर्जर इतिहास के पन्नो से //धनसिँह गुर्जर कोतवाल की कहानी पार्ट-1

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भारतीय जनमानस ने अंग्रेजी सरकार की बढ़ती शक्ति के विरुद्ध 1857 में आजादी की लड़ाई लड़ी ,जिसकी शुरुआत मेरठ से हुई। 1 मई 1857 की प्रातः को आकाश में आंधी ओर तूफान के सूचक काले बादल घिर रहे थे। सूर्य का पता न था । तीसरे रिसाले का कर्नल कारमाइल स्मिथ बहुत ही अहंकारी ओर हटी स्वभाव का था ।
उसने उन 85 सिपाहियो की,जिन्होंने चर्बी लगे कारतूस लेने से इनकार कर दिया था , वर्दी उतरवा दी तथा लोहारो को बुलाकर उन्हें हथकडी ओर बेड़ियो से जकड़वा दिया । पूरी ब्रिग्रेड में से सिपाही नागरिक जेल भेज दिए गए। अगले दिन शाम 5 बजे यकायक क्रांति की चिनगारी छूट पड़ी और बिजली सी कौध गई और यह सब आकस्मिक ही हुआ तीसरे रिसाले का रिसालदार अपने सिपाहियों को लेकर जेल में गया। उधर 10 वी इन्फेंटरि शस्त्रागार में पहुच गयी । पांचली का गुर्जर धनसिंह शहर कोतवाल था । पांचली ओर मेरठ के आसपास गुर्जर सबसे पहले आम जनता के साथ इक्कठे हुये । फिर कोतवाली गये ओर सिपाहियों ओर कोतवाल को लेकर जेल पहुच गए। नई जेल पर इन गुर्जरो ने आक्रमण कर दिया और 839 कैदी छुड़ा लाये । रिसाला भी 85 सिपाही ले आया

10 मई को 20 वी देशी रेजिमेंट के साथ तीसरी घुड़सवार सेना के सैनिक परेड के मैदान में इक्क्ठे हो गए और उन अफसरो को जान से मार डाला  जो उन्हें शांत करने का प्रयत्न कर  रहे थे | जितने अंग्रेज थे ,उन्हें काट डाला 11 वी व् 20 वी नेटिव इन्फेटरी,जेल से रिहाई पाने वाली भीड़ व् देहात की जनता शहर कोतवाल चौ.धनसिंह गुर्जर के नेतृत्व में,आसपास के गावो के उसके भाईबन्द पुलिस के यूरोपियन सिपाहियों के खून के प्यासे हो गए पूर्णतया अराजकता की स्थिती पैदा हो गयी यूरोपियन मार डाले गए, बंगले जला दिए गए | घर-घर में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी थी | भयाबह भूत-प्रेत पिशाच का रूप धारण क़िये उन्मुक्त भीड़ ब्रिटिश राज्य की सैन्य शक्ति को मिटा रही थी | हापुड़ बागपत और दिल्ली की सड़को पर हजारो व्यक्त्ति इक्क्ठे होकर सेना के साथ चारो और फैलकर राज्य सता मिटाने लगे |

विभिन्न तत्वों से निर्मित की यह चिंगारी , जो महज मेरठ के एक कोने में शुरु हुई ,सांस  बनकर अन्य कोनो में समाती चली गई और स्वपनो की तरह शांत बैठे,बोलते ,काम करते लोगो में घर कर गयी | यह सब आकस्मिक हुआ

      यो तो इस क्रांति में सभी वर्गों ने भाग लिया किन्तु इस आजादी की लड़ाई में मेरठ में देहाती जनता में सबसे पहले सेनिको का साथ गुर्जरो ने दिया सर हेनरी इलियट के.सी.बी. ने लिखा की – गुर्जरो ने उत्तर पशिचम भारत के मेरठ डिवीजन में 1857 के व्रिदोह में खास उपद्रव किये | हम लोगो को तकलीफ पहुंचाई| उन्होंने सिकरंदाबाद और दूसरे स्थानों पर बगावत एवं लूटपाट की | देहात में हमारे खिलाफ सिर्फ गुर्जर और रांघड़ ही थे | जो संकट काल में अराजकता पैदा करके अंग्रेजो के विरुद्ध हो उठे थे | डब्लयूँ. सी. क्रुक ने लिखा कि जिस प्रकार बाबर, शेरशाह आदि के समय गुर्जरो ने विद्रोह ,अराजकता एवं उपद्रव पैदा करके साम्राज्य स्थापना में अशांति और झगड़े पैदा किये,उसी प्रकार 1857 में भी उन्होंने अराजकता एवं उपद्रव पैदा किये | छूब्ध होकर उन्होंने हम पे तरह तरह के जुलम किये और फौजी कार्यवाही में बुरी तरह रोड़ा अटकाया | सर जॉन एडवर्ड बलफोर ने लिखा था की ” दिल्ली के चारो और के गुर्जरो के गांव  50 तक बिलकुल शांत रहने के बाद एकदम बिगड़ उठे और मेरठ में ग़दर होने के चन्द घण्टो के भीतर ही भीतर उन्होंने तमाम जिलों को लूट लिया | यदि कोई महत्वपूर्ण अधिकारी उनके गावो में शरण के लिए गया तो उसे नहीं छोड़ा गया और खुलेआम बगावत कर दी ‘

 

  •                                                  पार्ट 2 बहुत जल्द 

 

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